नही गुजरा हैँ वक्त अभी सदकर्मों को फिर से बीज लें
होगा फैसला कभी तेरे हक में कुछ तो सीख दुखों से ले
दुखों को तू खुदा की बेइंसाफी क्यों मान शिकवे
करता
सुखों को अपने दिमाग का लोहा मान शान से चलता हैं
बीजे थे कभी कहीं वही सदैव तेरे सामने आ ही जाते हैं
फसल मिली अच्छी या खराब से कला जीने कीसीख ले
ब्लाग - विचार सागर मंथन
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सतनाम सिंह साहनी
(पथिकअनजाना)
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