Friday, January 4, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०१२ --- न जाने न समझे क्या घटित-पथिक अनजाना) 04/01


जाने समझे क्या घटित हो रहा है इस सारे ही संसार में
मानवीय बस्तियों एंव मानवीय विचारों में तब्दीली आ गई हैं
एक ओर कब्रों की बस्तियाँ जमी पर फैलती बसती जा रही हैं
दूजी ओर बस्तियाँ व बस्तियाँ कब्रों में तब्दील  होती जा रही
इंसा बहुमंजिली इमारतों के बंद कक्षों रूपी कब्रों में जी रहा हैं
खुशियाँ भरी बस्तियाँ अभावों से  कब्रों में बदलती जा रही हैं
बस्तियाँ रात में खिलती कही कब्रें दिनरात उखाडी जा रही हैं
कहीं विचार प्रगति का ला अपने बोझों तले हडपी जा रही  हैं
एक समानता मुझे दोनों मे नजर आई कब्रें जी व मर रही हैं
कृपाणें सोई अन्याय के खिलाफ  नेता बिके कोडियों के भाव
जीते बेखौफ खोजते कहकहों तले जिन्दगी बसे मायूस ग्राम
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
ब्लाग – विचार सागर मंथन

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