Wednesday, January 23, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ०३१- निजात न पा सके जंग से -- सतनाम सिंह साहनी

देखो यारों मेरे विगत कर्मों की अपार मेहरबानियाँ

पहले मशगूल थे जंग ए जमाने से लडने में हम
अब मजबूर हो गये हैं बदन से जंग के मैदान में
मेहरबानियां कहें या कदम हमारी तकदीर के ऐसे
निजात न पायेंगें जंग से अपनों या गैर से कैसे
ब्लाग --  विचार सागर मंथन

पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी )

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