देखो यारों मेरे विगत कर्मों की अपार मेहरबानियाँ
पहले मशगूल थे जंग ए जमाने से लडने
में हम
अब मजबूर हो
गये हैं बदन से जंग के मैदान
में
मेहरबानियां कहें
या कदम
हमारी तकदीर के ऐसे
निजात न पायेंगें जंग
से अपनों या गैर
से कैसे
ब्लाग -- विचार
सागर मंथन
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी )
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