सत्य हैं कि अभिव्यक्ति
भी अनूठी लाजवाब कला हैंइच्छाओ के दायरे में गुण
किसी को भी घसीट लाना हैं
पढके चेहरा ढंग अभिव्यक्ति
का सदैव ही बदल जाता हें
लकीरें चेहरौं की कलायें हाथों
की भावभंगिमा में गुम होती हैं
नही जानते इंसा इस घडी में
क्या खोया क्या पाया उसने
घुमाकर बारंबार दिखाकर
सब्जबाग लूट लिया जाता हैं
शिकायत न कर पाते मूर्खता
अपनी को चर्चित पाता हैं
खोजें नई जमीं विश्वास की
नये पुल चिन्ता के बनाता हैं
गैरों से ज्यादा अपनों की
अभिव्यक्ति कि थाह पाता हैं
ब्लाग -- विचार सागर मंथन
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
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