गुरुवार, 21 मार्च 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०८५ - जब खोजते थे --- पथिक अनजाना

जब खोजते थे हमअपनों को यहाँ
दूर जाकर हमसे कही बैठे बेवजह
जब खोज रहे थे हमारे अपने.ही
हमें होके तन्हा मगरूर  बैठे थे
न जानू किस बात का था नाज
बीता कल था बीत रहा हैं आज
मानने मनाने में दी उम्र गुजार
यह न सोचा जीना क्यों हैं यार
जब  शारीरिक साथ छूटने लगे
तब मजबूरे हाल हम टूटने लगे
सपनों के ताबूतों पर जा हम बैठे
जाना कितनी खोजों में एक साथ
बीता दी हमने जिन्दगी की रात
बढाते संख्या अपनों व सपनों की
चाह ताउम्र बर्बादी की बनी वजह
काँच बटोरने की हमें मिली हैं सजा

पथिक अनजाना  (सतनाम सिंह साहनी)

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