Tuesday, March 19, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०८३ - हवाओं में बून्दों में -- पथिक अनजाना

हवाओं में बून्दों में जर्रे जर्रे में सुना खुदा हैँ
मानी दिल ने मौजूदगी जरूर हैँ पर न देखा
बहुत खोजा न पा सका अब तक मैँ तुझको
पूछी राह ज्ञानियों से जाना मौजूदगी मशहूर
न देखा ज्ञानियों ने न रूपआकार मैंने जाना
कहते सब पूर्वज मानते आये तुम भी मानो
ज्यादा पूछो कहे एहसास करो विश्वास करो
कहानी तरह सबने विभिन्न चित्रण पेशकिये
भ्रामक फैसला न कर यार खोजनआराधने का
निर्णय बीजारोपण सुकर्मों व प्रसारित मुस्कानें
खुदा कोऐसे पायेंगें कहलायेंगें पथिक अनजाने
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)



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