ताउम्र ढूंढते रहे
जिन हसीन खूश्बूदार फूलों को हम
थे गुलिस्ताँ
सामने, लगे महकती खुश्बू फूलों की हैं
बैचैन हो गये करीब
नकली फूल थे व असली काँटे
लगे ये फूल हमें
नागों के फन हर फूल डसने लगा
उलझे काँटों में,
सारा गुलिस्तां हम पर हंसने लगा
फंस मृगमरीचिका
में, न सोचा ज्ञानी क्या कह गये
खुश्बू नही जमाने
में सिर्फ कागजी फूल ही रह गये
पथिक अनजाना (
सतनाम सिंह साहनी)
No comments:
Post a Comment
on comment page