Monday, March 18, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ०८२ - खुश्बू नही जमाने में सिर्फ -- पथिक अनजाना

ताउम्र ढूंढते रहे जिन हसीन खूश्बूदार फूलों को हम
थे गुलिस्ताँ सामने, लगे महकती खुश्बू फूलों की हैं
बैचैन हो गये करीब नकली फूल थे व असली काँटे
लगे ये फूल हमें नागों के फन हर फूल डसने लगा
उलझे काँटों में, सारा गुलिस्तां हम पर हंसने लगा
फंस मृगमरीचिका में, न सोचा ज्ञानी क्या कह गये
खुश्बू नही जमाने में सिर्फ कागजी फूल ही रह गये
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)



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