Monday, February 19, 2024

अभिव्यक्ति क्रमांक १०४ -- उडते परिन्दे -- पथिक अनजाना

उडते परिन्दे जाके खुली हवा में हैं
नजरें घुमाते जब वह जमीन पर हैं
पड जाते पेशोपश में जायें ही क्यों
देख जमीं हाल सोचे क्यों जिये यों
न पनाह सकूं की जमी पर न यहाँ
कल्पना स्वर्ग की हम खोजे हैं कहाँ
-------   पथिक   अनजाना


No comments:

Post a Comment

on comment page