उडते परिन्दे जाके खुली हवा में हैं
नजरें घुमाते जब वह जमीन पर हैं
पड जाते पेशोपश में जायें ही क्यों
देख जमीं हाल सोचे क्यों जिये यों
न पनाह सकूं की जमी पर न यहाँ
कल्पना स्वर्ग की हम खोजे हैं कहाँ
------- पथिक अनजाना
नजरें घुमाते जब वह जमीन पर हैं
पड जाते पेशोपश में जायें ही क्यों
देख जमीं हाल सोचे क्यों जिये यों
न पनाह सकूं की जमी पर न यहाँ
कल्पना स्वर्ग की हम खोजे हैं कहाँ
------- पथिक अनजाना
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