सुनी रजनीश से इक कहानी
स्वर्ग हैं खिडकी से बाहर
किसी अस्पताल के
किसी मंजिल के हाल के कोने पर
सटी खिडकी से बाहर
स्वर्ग रोगी का अजीब ख्याल था
तमाम रोगी मांगते
दुआ कब वो रोगी कहलावे मुआ हैं
ताकि जा विराजे उस
स्वर्ग के दरवाजे पर वे जीते जी
फरियाद होती कबूल मंजिल
पर न मिलता स्वर्ग वहाँ
पर खीझ मिटाने को
मुस्कराते कहते मौजूद स्वर्ग यहाँ
कुछ ऐसा विचार
लगता मुझे उस अनदेखे खुदा का हैं
रोटियाँ बोटियाँ
सेक सेवक न थके, हो कैसे खुदा फिदा
जवाब हैं इक जिसे
पूजते सब वास्तविक खुदा से जुदा
बच्चे सारे एक से
कैसे कहैं हैं वह चापलूसों का पिता
पथिक अनजाना (
सतनाम सिंह साहनी)
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