झौंके आ आकर हवाऔं
के लौ दीपक की
हंसते हुये बुझाने
की कोशिशें वे करते हैं
लौ ताउम्र हाल पर
थिरकतीसिसकती हुई
कभी हंसे तो रोये
किस्मत पर वो अपनी
अनजाने सयाने
परवाने बन हुये मशगूल
मानों द्रौपदी का
वह चीरहरण कर रहे थे
लगे ज्योति मेरी
जिन्दगी हैं खुदा की दी
सजायें ,बेवफायें
रूपी परवाने बरसते रहे
मायारूप हंसते, हम
बचने को तरसते रहे
गरजते रहनुमां
देखे वे भी हमें डसते रहे
कर्मरुपी तेल बचता
वक्त खिसकता रहा
माया से बचने की
सोचे सुकर्मों को लोचे
लगे तूफां भीतर बाहर
के बने हमारे बोझे
लें पनाह कहाँ,
हाल देख परवाने हंसते रहे
पथिक अनजाना (
सतनाम सिंह साहनी)
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